बॉन्ड क्या होते हैं | बॉन्ड्स में कैसे निवेश करें

मार्केट में मुख्यतः दो प्रकार के निवेशक होते हैं। एक वे जो स्टॉक मार्केट के उतार-चढ़ाव को पसंद नहीं करते हैं जिसकी वजह से वे शेयर मार्केट में निवेश भी नहीं करते। दूसरे वो निवेशक होते हैं जो अपने पोर्टफोलियो को डायवर्सिफिकेशन देना चाहते हैं और अपने पैसे को अलग-अलग जगह निवेश करते हैं।

इन दोनों प्रकार के निवेशकों के लिए बॉन्ड्स (Bonds) बेहतरीन विकल्प हो सकते हैं। Bonds आपको स्टॉक मार्केट से कम परन्तु बैंक फिक्स्ड डिपाजिट से ज्यादा रिटर्न देने की क्षमता रखते हैं। भारत में बॉन्ड मार्केट अभी उतना विकास नहीं कर पाया हैं। इसका मुख्य कारण हैं की निवेशकों को ये भी नहीं पता की बॉन्ड्स में निवेश कैसे करें। लेकिन भविष्य में बॉन्ड मार्केट के भारत में ज्यादा गति से विस्तार करने की संभावना हैं।

एक स्मार्ट इन्वेस्टर के नाते आपको Bonds के बारें में सही जानकारी होनी चाहिए। ये आर्टिकल पूर्णतया बॉन्ड पर आधारित हैं जिसे पढ़ने के बाद आप अपने Investing ज्ञान को एक स्टेप ऊपर ले जायेंगे। आज हम बात करेंगे की Bond क्या होते हैं (What are Bonds), बॉन्ड्स में कैसे इन्वेस्ट करें, बॉन्ड्स के प्रकार और इससे जुड़ी हर जानकरी।

बॉन्ड क्या होते हैं (What is Bond in Hindi)

बॉन्ड एक डेब्ट इंस्ट्रूमेंट होता हैं जिसका हिंदी में अर्थ प्रतिभूति या ऋणपत्र होता हैं। बॉन्ड्स के माध्यम से वित्तीय संस्थान और रिटेल निवेशक जैसे की आप और मैं बॉन्ड जारीकर्ता को Loan उपलब्ध करवाते हैं। बॉन्ड जारीकर्ता जिससे पैसे उधार ले रहा हैं उसे बॉन्ड जारी करता हैं। इसके बदले में वो एक निश्चित ब्याज दर का भुगतान करने का वादा करता हैं। इन जारी किये बॉन्ड्स पर ब्याज दर लिखी होती हैं जिसे कूपन रेट भी कहा जाता हैं।

उदाहरण के लिए मुझे ₹1,000 की आवश्यकता हैं। ये ₹1,000 आप मुझे उधार देते हैं। इसके बदलें मैं, आपको 10% ब्याज वाला ₹1,000 का बॉन्ड एक वर्ष की maturity के साथ जारी कर देता हूँ। एक वर्ष बाद आप मुझे मेरा बॉन्ड वापस देंगे और मैं आपको ₹1,000 प्लस 10% ब्याज का भुगतान करूँगा।

Bonds मुख्य रूप से सरकार और कंपनियों के द्वारा जारी किये जाते हैं। निवेश जगत में बॉन्ड्स काफी हद तक सुरक्षित माने जाते हैं जो collateral द्वारा सुरक्षित होते हैं। कंपनी का बॉन्ड धारक को भुगतान करने का प्रथम दायित्व होता हैं।

Bonds कैसे काम करते हैं (How does Bonds works)

जब भी सरकार को सरकारी योजनाओं के लिए पैसों की आवश्यकता होती हैं तो सरकार बांड्स जारी करके पैसे जुटा सकती हैं। वैसे ही अगर किसी कंपनी को वित्त की जरुरत होती हैं तो उसके पास मुख्यतया तीन विकल्प होते हैं।

  • पहला शेयर मार्केट में इक्विटी शेयर इशू करना। इसमें कंपनी के शेयर dilute होते हैं।
  • दूसरा विकल्प होता हैं बैंक लोन। परन्तु ये कंपनी को बहुत महँगा पड़ता हैं क्योंकि इसमें ब्याज दर बहुत ज्यादा होती हैं।
  • तीसरा विकल्प होता हैं बॉन्ड्स जारी करके पैसे जुटाना। इसमें बैंक लोन की अपेक्षा ब्याज दर कम होती हैं और कंपनी को अपनी इक्विटी भी dilute नहीं करनी पड़ती।

इस प्रकार कंपनी मार्केट से पैसे उठाती हैं। इसके बदले वो निश्चित ब्याज दर वाले Bond जारी करती हैं। आजकल ये बांड सर्टिफिकेट फॉर्म के बजाय डिजिटल फॉर्म में होते हैं। इनकी परिपक्वता अवधि निश्चित होती हैं जैसे की 3 वर्ष, 5 वर्ष, 10 वर्ष आदि।

बॉन्ड जारीकर्ता एक निश्चित अंतराल में बॉन्ड धारक को ब्याज का भुगतान करता रहता हैं। परिपक्वता अवधि (maturity period) समाप्त होने पर बॉन्ड जारीकर्ता प्रिंसिपल अमाउंट और ब्याज का भुगतान बॉन्ड धारक को कर देता हैं।

Bonds कितना रिटर्न देते हैं?

बॉण्ड जारी करते समय इन पर एक निश्चित ब्याज की दर तय कर ली जाती हैं। Bond interest Rate को कूपन रेट भी कहा जाता हैं। आमतौर पर बॉन्ड्स के रिटर्न 5 से 14% के बीच में होते हैं। सभी बॉन्ड्स को अलग-अलग रेटिंग भी दी जाती हैं। ये रेटिंग उधारकर्ता (borrower) की पैसे वापस करने की क्षमता के आधार पर जारी की जाती हैं।

रिस्की बॉन्ड फण्ड में आपको ज्यादा ब्याज दर ऑफर की जाती हैं। जबकि कम रिस्की बांड्स में कम Interest Rate रहती हैं जैसे की गवर्नमेंट बॉन्ड्स। बॉन्ड्स का वास्तविक रिटर्न YTM होता हैं यानि की Yield to Maturity.

Yield to Maturity क्या होता हैं (What is Bond Yield) 

बॉन्ड खरीदते समय वास्तविक रिटर्न जानने के लिए हमेशा यील्ड टू मैच्योरिटी ही देखनी चाहिए। बॉन्ड की इंटरेस्ट रेट और YTM दोनों अलग-अलग रहते हैं। चलिए इसे एक उदाहरण की सहायता से समझते हैं।

केस – 1 

Buying Price (फेस वैल्यू) ₹1,00,000
होल्डिंग पीरियड 12 महीने
मैच्योरिटी पीरियड 12 महीने
कूपन रेट 10%
Selling value (फेस वैल्यू) ₹1,00,000
कैपिटल गेन 0
Interest Income ₹10,000
Yield to Maturity (YTM) ( 10,000 ÷ 1,00,000 ) × 100 = 10%

इस केस में आप बॉन्ड को मैच्योरिटी पीरियड तक होल्ड कर रहे हो। इसलिए आपको बॉन्ड वापस बॉन्ड जारीकर्ता को ही देना पड़ेगा जिसका मूल्य फेस वैल्यू पर ही होगा। इस वजह से आपको इस केस में कोई भी कैपिटल गेन नहीं होगा। इस प्रकार यील्ड टू मैच्योरिटी प्राप्त इंटरेस्ट के आधार पर निकाली जाएगी।

केस – 2

Buying Price (फेस वैल्यू) ₹1,00,000
होल्डिंग पीरियड 12 महीने
मैच्योरिटी पीरियड 60 महीने
कूपन रेट 10%
Selling value ₹1,20,000
कैपिटल गेन ₹20,000 (₹1,20,000 – ₹1,00,000)
Interest Income ₹10,000
Yield to Maturity (YTM) ( 30,000 ÷ 1,00,000 ) × 100 = 30%

दूसरे केस में आपने बांड को होल्डिंग पीरियड जो की 60 माह का हैं, उससे पहले ही बेच दिया हैं। मार्केट में बेचने के कारण आपने इसे ₹20,000 के कैपिटल गेन के साथ बेचा हैं। इसलिए इस बॉन्ड की Yield to Maturity प्राप्त ब्याज और कैपिटल गेन को जोड़कर निकाली जाएगी।

केस – 3

Buying Price (फेस वैल्यू) ₹1,00,000
होल्डिंग पीरियड 12 महीने
मैच्योरिटी पीरियड 60 महीने
कूपन रेट 10%
Selling value ₹95,000
कैपिटल गेन – ₹5,000 (₹95,000 – ₹1,00,000)
Interest Income ₹10,000
Yield to Maturity (YTM) ( 5,000 ÷ 1,00,000 ) × 100 = 5%

इस केस में भी बांड परिपक्वता अवधि से पहले ही बेच दिया गया हैं। परन्तु मांग में कमी के कारण ये बॉन्ड अपनी फेस वैल्यू से कम पर बिका हैं। इसलिए यहां पर मात्र ₹5,000 के शुद्ध लाभ पर YTM निकाला गया हैं। ध्यान देने वाली बात हैं की अगर इस बॉन्ड को आप 60 माह बाद बॉन्ड जारीकर्ता को वापस करते तो आपको पुरे एक लाख रुपये मिलते न की ₹95,000.

इस प्रकार बॉन्ड्स का वास्तविक रिटर्न यील्ड टू मैच्योरिटी होता हैं न की कूपन रेट। YTM सम्पूर्ण बॉन्ड अवधि के रिटर्न्स के आधार पर निकाला जाता हैं। 

बॉन्ड में Accrued Interest क्या होता हैं?

अगर बॉन्ड धारक अपने बॉन्ड को अगली इंटरेस्ट पेमेंट की तारीख से पहले ही बेच देता हैं तो नए Buyer को Estimated Interest का भुगतान सेलर को करना होता हैं। आसान शब्दों में समझे तो जितने समय के लिए बॉन्ड धारक ने बॉन्ड को होल्ड किया हैं उसका ब्याज वो नए क्रेता से वसूल करता हैं। इसे ही Accrued Interest कहा जाता हैं।

चलिए इसे एक उदाहरण से समझते हैं –

मान लीजिये आपके पास एक Bond हैं जिस पर आपको अगले 12 महीने बाद ब्याज प्राप्त होगा। अगर आप ये बॉन्ड 8 महीने होल्ड करके ही बेच रहे हो तो buyer आपको इन 8 महीनों का ब्याज भी देगा। क्योंकि 4 महीने बाद पूरा ब्याज क्रेता को मिलेगा। 12 महीने में से 8 महीने का ब्याज पुराने बॉन्ड धारक को क्रेता बॉन्ड खरीदने के साथ ही कर देगा। ये 8 महीने का ब्याज ही Accrued Interest होगा।

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बॉन्ड्स के फायदे और नुकसान

बॉन्ड में निवेश करने के कुछ फायदों के साथ कुछ नुकसान भी होते हैं जिनका आपको ध्यान रखना आवश्यक हैं।

बॉन्ड के फ़ायदे (Benefits of Bonds)

(i) बढ़िया रिटर्न्स – बॉन्ड एक ऐसा लॉन्ग टर्म इन्वेस्टमेंट हैं जो आपको अन्य निवेश विकल्पों के मुकाबले फिक्स और अच्छी ब्याज दर ऑफर करता हैं। इनके रिटर्न बैंक फिक्स्ड डिपाजिट और सेविंग अकाउंट से ज्यादा होते हैं। बॉन्ड्स के रिटर्न आपको इन्फ्लेशन को बीट करने में भी मदद करते हैं।

(ii) कम जोखिम – कंपनियां जो बॉन्ड्स के माध्यम से पैसा उठाती हैं बॉन्ड होल्डर्स को पैसा वापस लौटना उनका प्रथम दायित्व होता हैं। जबकि सरकारी बॉन्ड्स मामले में रिस्क न के बराबर होती हैं। बांड में दोनों पार्टियों के बीच एक फाइनेंसियल कॉन्ट्रैक्ट होता हैं जिसके अंतर्गत borrower का due टाइम में पैसा वापस लौटाने का लीगल दायित्व होता हैं।

इस तरह आपको बॉन्ड्स में कम रिस्क पर अच्छे रिटर्न प्राप्त हो जाते हैं।

(iii) पोर्टफोलियो डायवर्सिफिकेशन – बॉन्ड आपके पोर्टफोलियो को एक फिक्स ब्याज दर और सुरक्षा के साथ स्थायित्व प्रदान करता हैं। अगर आप स्टॉक मार्केट, म्यूच्यूअल फण्ड, पब्लिक प्रोविडेंट फण्ड आदि में निवेश करते हो तो निवेश का कुछ हिस्सा बांड्स में लगाकर अपने पोर्टफोलियो को डाइवर्सिफाई का सकते हो।

अलग-अलग इन्वेस्टमेंट विकल्पों में निवेश करने की वजह से रिस्क कम हो जाती हैं।

(iv) Pledging – कई वित्तीय संस्थान (Financial institutions) आपको बॉन्ड्स को प्लेज रखने की सुविधा भी देते हैं।

बॉन्ड के नुकसान (Disadvantages of Bonds)

  • Inflation रेट बढ़ जाने और अर्थव्यवस्था में मंदी की वजह से हाई रेटिंग वाले बॉन्ड्स निवेशकों को इन्फ्लेशन से भी कम ब्याज दर ऑफर करने लग जाते हैं।
  • बॉन्ड्स में एक निश्चित परिपक्वता अवधि होती हैं। इसलिए आपको बॉन्ड बेचने के लिए मैच्योरिटी तक इंतजार करना पड़ सकता हैं। हालांकि आप बांड्स को किसी मध्यस्थ (intermediary) के माध्यम से बेच सकते हैं।
  • बॉन्ड्स के रिटर्न शेयर और म्यूच्यूअल फण्ड की तुलना में कम रहते हैं।
  • कंपनी के दिवालिया होने की स्थिति में पैसा डूबने का ख़तरा रहता हैं।

बॉन्ड्स के प्रकार (Types of Bonds)

(1) सरकारी बॉन्ड (Government Bonds) – सरकार को जब भी अपनी योजनाओं को पूरा करने के लिए धनराशि की आवश्यकता होती हैं तो वो सरकारी बॉन्ड्स जारी करके पैसा इकट्ठा करती हैं। इन बॉन्ड्स में सरकार की गारंटी होती हैं इसलिए इनके डिफ़ॉल्ट करने की सम्भावना न के बराबर होती हैं। इस वजह से इनमें ऑफर की जाने वाली ब्याज दर भी कम होती हैं।

(2) मुन्सिपल बॉन्ड (Municipal Bonds) – इस प्रकार के बॉन्ड्स लॉकल सरकार या नगर निगम अपनी वित्तीय आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए जारी करती हैं।

(3) कॉर्पोरेट बॉन्ड (Corporate Bonds) – ये बॉन्ड प्राइवेट कंपनी के द्वारा जारी किये जाते हैं। इस प्रकार के बांड्स में रिस्क थोड़ी ज्यादा होती हैं लेकिन ब्याज दर भी ज्यादा होती हैं।

(4) सिक्योर्ड बॉन्ड (Secured Bonds) – ये बॉन्ड्स सिक्योर होते हैं। जिस कंपनी ने आपसे पैसा उधार लिया हैं उसे आपका पैसा वापस चुकाना ही होता हैं। चाहे कंपनी घाटे में ही क्यों न चल रही हो। पैसा वापस न चुकाने पर आप कंपनी के ऊपर केस भी कर सकते हो। सिक्योर्ड बॉन्ड में ब्याज दर कम होती हैं।

(5) अनसिक्योर्ड बॉन्ड (Unsecured Bonds) – इस प्रकार के बॉन्ड्स काफी रिस्की माने जाते हैं। अगर कंपनी आपका पैसा वापस लौटने से मना करती हैं तो आप कंपनी के ऊपर केस भी नहीं कर सकते। ये बांड्स आपको High Interest रेट ऑफर करते हैं।

(6) फिक्स्ड इंटरेस्ट बॉन्ड (Fixed Interest Bonds) – इस प्रकार के बांड्स के मामले में बांड धारक को बांड की पूरी अवधि के दौरान एक ही ब्याज दर प्राप्त होती हैं। इनकी ब्याज दर में कोई बदलाव नहीं होता।

(7) फ्लोटिंग इंटरेस्ट बॉन्ड (Floating Interest Bonds) – ऐसे बॉन्ड्स में कूपन रेट बॉन्ड टेन्योर के दौरान नियमित रूप से बदलती रहती हैं। Interest Rate मार्केट कंडीशन, इन्फ्लेशन जैसे फैक्टर्स पर निर्भर करती हैं।

(8) इन्फ्लेशन लिंक्ड बॉन्ड (Inflation Linked Bonds) – इन बॉन्ड्स का रिटर्न मुद्रास्फीति की दर के अनुसार ही होता हैं।

(9) परपेचुअल बॉन्ड (Perpetual Bonds) – इस प्रकार के बॉन्ड्स में कोई मैच्योरिटी अवधि निश्चित नहीं होती। बॉन्ड जारीकर्ता के ऊपर प्रिंसिपल अमाउंट को वापस चुकाने का कोई दायित्व नहीं होता। ये बॉन्ड्स लम्बे समय तक रेगुलर इनकम के रूप में ब्याज कमाने के लिए ख़रीदे जाते हैं।

Bonds में कैसे इन्वेस्ट करें (How to invest in Bonds)

भारत में अधिकतर लोगों को जानकारी नहीं हैं की बॉन्ड में इन्वेस्ट कैसे किया जाये। इसी वजह से भारत में बॉन्ड मार्केट का इतना विकास नहीं हुआ हैं।

बॉन्ड्स में इन्वेस्ट करने के तरीके –

(i) डेब्ट फण्ड – बॉन्ड्स में निवेश करने का पहला तरीका हैं डेब्ट फण्ड। डेब्ट फण्ड म्यूच्यूअल फण्ड का ही एक प्रकार हैं। डेब्ट फंड बॉन्ड्स में इन्वेस्ट करने का एक इनडायरेक्ट तरीका हैं। डेब्ट फण्ड के माध्यम से निवेश करने पर आपको 1 से 2% का एक्सपेंस रेश्यो देना पड़ता हैं जो आपके रिटर्न्स को कम कर देता हैं। इसी वजह से ये तरीका बॉन्ड्स में निवेश करने का अच्छा तरीका नहीं माना जाता।

सरकारी बॉन्ड्स में इन्वेस्ट करने के लिए आप गिल्ट फण्ड में निवेश कर सकते हैं।

(ii) ऑनलाइन प्लेटफार्म – आप ऑनलाइन डायरेक्ट बॉन्ड खरीद सकते हो। ये तरीका बांड खरीदने का बेस्ट माध्यम हैं। आप निम्न वेबसाइट के द्वारा ऑनलाइन बॉन्ड खरीद सकते हैं –

इन ऑनलाइन वेबसाइट से बॉन्ड खरीदने पर ये आपके डीमैट अकाउंट में क्रेडिट कर दिए जाते हैं। अगर बाद में ये वेबसाइट या प्लेटफार्म बंद भी हुए तो भी आपके बॉन्ड आपके पास सुरक्षित रहेंगे।

(iii) स्टॉक ब्रोकर के द्वारा – कई कॉर्पोरेट बॉन्ड्स एक्सचेंज के ऊपर भी ट्रेड होते हैं। आप अपने स्टॉक ब्रोकर के माध्यम से बांड खरीद और बेच सकते हैं। आजकल गवर्नमेंट बॉन्ड्स भी बिड्स के माध्यम से स्टॉक ब्रोकर की सहायता से खरीदे जा सकते हैं।

(iv) कमर्शियल बैंक – सीधे बैंक के द्वारा भी आप बॉन्ड खरीद सकते हैं।

इन सब के अतिरिक्त जो कंपनी अपना बॉन्ड जारी कर रही हैं आप उनकी ऑफिसियल वेबसाइट या ऑफिस जाकर भी बॉन्ड खरीद सकते हैं।

बॉन्ड्स पर टैक्स (Tax on Bonds)

बॉन्ड इन्वेस्टमेंट में कुछ टैक्स फ्री बॉन्ड भी उपलब्ध रहते हैं। टैक्स फ्री बॉन्ड अधिकतर PSU कंपनियों द्वारा जारी किये जाते हैं जैसे HUDCO, NHAI, REC आदि।

लिस्टेड बॉन्ड और अनलिस्टेड बॉन्ड दोनों का टैक्स ट्रीटमेंट अलग-अलग होता हैं। लिस्टेड बॉन्ड वो होते हैं जो स्टॉक एक्सचेंज पर लिस्ट होते हैं। इनका टैक्स ट्रीटमेंट स्टॉक्स के जैसा ही होता हैं।

अगर आप लिस्टेड बॉन्ड्स को 12 महीनें से कम अवधि के लिए रखकर बेचते हो तो आपको शॉर्ट टर्म कैपिटल गेन (STCG) होगा। इसका प्रॉफिट आपकी रेगुलर आय में जुड़कर आपकी वर्तमान टैक्स स्लैब के अनुसार टैक्सेबल होगा।

लिस्टेड बॉन्ड को 12 महीनें या अधिक समय तक होल्ड करके बेचने पर लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन (LTCG) होता हैं। इस लाभ पर LTCG टैक्स लगता हैं जो की  10% से टैक्सेबल होता हैं।

वही अनलिस्टेड बॉन्ड्स के मामले में 36 महीने से कम के लिए STCG होता हैं। ये लाभ आपकी आय में जुड़ जाता हैं जिस पर आपकी टैक्स स्लैब के अनुसार टैक्स लगता हैं।

अनलिस्टेड बॉन्ड को 36 या ज्यादा होल्ड करके बेचने पर होने वाला लाभ पर LTCG टैक्स लगता हैं। वर्तमान में इसकी दर 10% हैं।

Bonds में किसे इन्वेस्ट करना चाहिए?

बांड में निवेश करने का उद्देश्य प्रत्येक निवेशक का अलग-अलग हो सकता हैं। अगर आप एक नियमित रिटर्न प्राप्त करना चाहते हैं जो कि बैंक FD से ज्यादा हो तो आप बॉन्ड्स में निवेश कर सकते हैं। बॉन्ड आपको स्टॉक मार्केट से कम परंतु एफडी से ज्यादा रिटर्न दे सकते हैं।

ऐसे निवेशक जो अपना पैसा बहुत कम रिस्की जगह लगाना चाहते हैं बॉन्ड उनके लिए अच्छा विकल्प हो सकता हैं।

बॉन्ड्स की मैच्योरिटी अवधि थोड़ी लंबी होती हैं। इसलिए हमेशा इसमें वही पैसा निवेश करें जिसकी आपको निकट भविष्य में आवश्यकता नहीं हैं। अगर आप अपने पोर्टफोलियो को डायवर्सिफाई करना चाहते हैं यानि की आप अपने पैसों को अलग-अलग जगह निवेश करना चाहते हैं तो भी आप बॉन्ड्स में निवेश कर सकते हैं।

निष्कर्ष

लम्बी अवधि के लिए एक स्थिर आय पाने के लिए बॉन्ड अच्छा विकल्प हो सकता हैं। परन्तु आपको रिस्की बॉन्ड खरीदने से बचना चाहिए। मेरी राय में आपको AAA रेटिंग वाले बॉन्ड ही खरीदने चाहिए। साथ ही बॉन्ड खरीदते समय हमेशा यील्ड टू मैच्योरिटी (YTM) देखकर ही बॉन्ड खरीदें।

अगर आपको बॉन्ड क्या होते हैं (What are Bonds in Hindi) की जानकारी अच्छी लगी तो इसे अपने दोस्तों के साथ सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर जरूर शेयर करें।

FAQ on What are Bonds

  1. बॉन्ड कितने प्रकार के होते हैं?

    बॉन्ड अनेक प्रकार के होते हैं जैसे की कॉर्पोरेट बॉन्ड्स, गवर्नमेंट बॉन्ड्स, सिक्योर्ड बॉन्ड्स, अनसिक्योर्ड बांड्स, परपेचुअल बॉन्ड्स, इन्फ्लेशन लिंक्ड बॉन्ड आदि।

  2. शेयर और बॉन्ड में क्या अंतर हैं?

    जब एक निवेशक शेयर खरीदता हैं तो वो कंपनी का कुछ हिस्सा खरीदता हैं। वही जब कोई बांड खरीदता हैं इसका मतलब हुआ की वो कंपनी को या बॉन्ड जारीकर्ता को पैसे उधार दे रहा हैं।

  3. सरकारी बॉन्ड कैसे खरीदें?

    आप सरकारी बांड के रूप में गिल्ट म्यूच्यूअल फंड खरीद सकते हैं। इसके अतिरिक्त रिटेल निवेशक स्टॉक एक्सचेंज पर स्वयं को non-competitive बिड के लिए रजिस्टर करके गवर्नमेंट बॉन्ड खरीद सकते हैं। आप सीधे स्टॉक ब्रोकर के माध्यम से भी गवर्नमेंट बॉन्ड में निवेश कर सकते हैं।

  4. क्या बॉन्ड खरीदने के लिए डीमैट अकाउंट जरुरी हैं?

    बॉन्ड खरीदने के लिए डीमैट अकाउंट आवश्यक नहीं हैं। परन्तु ऑनलाइन प्लेटफॉर्म और स्टॉक ब्रोकर के माध्यम से बॉन्ड ख़रीदने के लिए डीमैट अकाउंट जरुरी हैं।

  5. क्या एक NRI भारतीय बॉन्ड ख़रीद सकता हैं?

    जी हां, एक NRI भी भारतीय बॉन्ड ख़रीद सकता हैं।

  6. बॉन्ड्स में Yield to Maturity क्या होता हैं?

    बॉन्ड में सम्पूर्ण बॉन्ड अवधि के दौरान मिलने वाले कुल रिटर्न को यील्ड टू मैच्योरिटी कहा जाता हैं। इसमें ब्याज और कैपिटल गेन शामिल होता हैं।

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