IPO ग्रे मार्केट प्रीमियम क्या हैं | GMP की सम्पूर्ण जानकारी

अगर आप IPO में निवेश करते हैं तो आपने GMP का नाम तो सुना ही होगा। आज के समय में IPO में रिटेल निवेशकों द्वारा जमकर पैसा लगाया जाता हैं। साथ ही अधिकांश रिटेल निवेशक IPO Grey Market Premium के आधार पर ही IPO में निवेश करने या नहीं करने का निर्णय लेते हैं।

परन्तु अधिकतर निवेशकों को IPO GMP क्या हैं (What is GMP in IPO), की सही जानकारी नहीं होती। आज हम इस आर्टिकल में IPO GMP के बारे में ही बात करेंगे जिसमें शामिल होगा IPO GMP क्या हैं, GMP की कैलकुलेशन, GMP कैसे काम करती हैं और कोस्टक रेट और सब्जेक्ट टू सौदा क्या होता हैं।

GMP Meaning

GMP मीनिंग की बात की जाये तो इसकी फुल फॉर्म Grey Market Premium होती हैं। इस प्रकार साधारण शब्दों में ग्रे मार्केट प्रीमियम का अर्थ हुआ की किसी आईपीओ शेयर का ग्रे मार्केट में प्रीमियम कितना चल रहा हैं।

IPO GMP क्या हैं (What is Grey Market Premium in Hindi)

IPO के द्वारा स्टॉक मार्केट में लिस्ट होने से पहले उस कंपनी के शेयर ग्रे मार्केट में ट्रेड होते हैं। इस ट्रेडिंग के आधार पर ही IPO ग्रे मार्केट प्रीमियम निकल कर आता हैं।

GMP वह मूल्य होता हैं जो की क्रेता को एक शेयर की इशू प्राइस के ऊपर चुकाना होता हैं। अगर कोई आईपीओ का एक शेयर ₹100 की इशू प्राइस के साथ आया हैं। यदि इस शेयर का GMP ₹10 चल रहा हैं तो क्रेता को इसे ग्रे मार्केट में खरीदने के लिए ₹110 देने होंगे।

ग्रे मार्केट प्रीमियम हमेशा एक शेयर का ही होता हैं। ये GMP निवेशकों को एक अंदाजा देता हैं की शेयर्स की लिस्टिंग अच्छी होगी या नहीं।

Grey Market Premium में ग्रे शब्द का क्या अर्थ होता हैं?

वैधानिक तरीके से किसी कंपनी के शेयर प्राइमरी मार्केट और सेकेंडरी मार्केट में ही ट्रेड होते हैं जो की स्टॉक एक्सचेंज के माध्यम से ट्रेड किये जाते हैं।

IPO में इशू किये गए शेयर प्राइमरी मार्केट के अंतर्गत आते हैं जबकि शेयर लिस्ट होने के बाद स्टॉक एक्सचेंज पर सेकेंडरी मार्केट में ट्रेड होते हैं। जो ट्रेडिंग प्राइमरी मार्केट और सेकेंडरी मार्केट से पहले होती हैं वो ग्रे मार्केट कहलाती हैं।

ग्रे मार्केट प्रीमियम में ग्रे शब्द अनऑफिशियल को इंगित करता हैं। इसका मतलब हुआ की GMP वैध मार्केट की टर्म नहीं हैं। प्राइमरी मार्केट और सेकेंडरी मार्केट दोनों सेबी द्वारा रेगुलेटेड होते हैं जबकि ग्रे मार्केट नहीं।

GMP कैसे काम करता हैं?

IPO ग्रे मार्केट एक अनऑफिशियल मार्केट होता हैं जहां आईपीओ एप्लीकेशन या शेयर स्टॉक मार्केट में ऑफिसियल ट्रेडिंग से पहले ख़रीदे और बेचे जाते हैं।

  1. निवेशक आईपीओ के माध्यम से किसी कंपनी के शेयर आवंटन के लिए आईपीओ में आवेदन करता हैं। इस दौरान निवेशक वित्तीय जोखिम उठाता हैं। पहली जोखिम की उसको कोई शेयर आवंटित ही न हो। दूसरी अगर शेयर आवंटित हो जाए लेकिन वे इशू प्राइस से नीचे लिस्ट हो जाये। चलिए इस प्रकार के निवेशकों को हम विक्रेता (sellers) की संज्ञा देते हैं।
  2. इस प्रकार के निवेशकों के अतिरिक्त कुछ ऐसे व्यक्ति भी होते हैं जो ये सोचते हैं की आईपीओ के शेयर्स का मूल्य इशू प्राइस से ज्यादा हैं और शेयर अच्छे मूल्य पर लिस्ट होंगे। ऐसी आशा में ऐसे निवेशक आईपीओ अलॉटमेंट होने से पहले ही ग्रे मार्केट डीलर्स के माध्यम से शेयर खरीदना चालू कर देते हैं। ये क्रेता (buyers) कहलाते हैं।
  3. ये buyers ग्रे मार्केट डीलर्स से संपर्क करते हैं और एक निश्चित प्रीमियम पर अपना आर्डर प्लेस करने को कहते हैं।
  4. ग्रे मार्केट डीलर उन निवेशकों से सम्पर्क करता हैं जिन्होंने IPO में अप्लाई किया था और वो अपनी एप्लीकेशन ग्रे मार्केट में बेचने को तैयार हैं। डीलर उन्हें वो प्रीमियम ऑफर करता हैं जो क्रेता के द्वारा उसे क्वोट किया गया हैं। (अगर आईपीओ अलॉटमेंट मिला तो)
  5. यदि सेलर को दिया गया ऑफर अच्छा लगता हैं और वो शेयर लिस्टिंग की जोखिम से बचना चाहता हैं तो वो अपनी आईपीओ एप्लीकेशन को ग्रे मार्केट डीलर के द्वारा क्रेता को बेच देता हैं।
  6. ये सौदा buyer और seller के मध्य होता हैं लेकिन ग्रे मार्केट डीलर मध्यस्थ होता हैं।
  7. ग्रे मार्केट डीलर सेलर से आईपीओ एप्लीकेशन के बारे में जानकारी ले लेता हैं और क्रेता को सूचित कर देता हैं की उसने निश्चित कीमत पर डील बुक कर दी हैं।
  8. अलॉटमेंट कम्पलीट होने के बाद शेयर सेलर (वास्तविक आईपीओ धारक) को आवंटित हो भी सकते हैं और नहीं भी। यदि शेयर आवंटित नहीं होते हैं तो buyer और seller के मध्य समझौता वही कैंसिल हो जाता हैं।
  9. यदि निवेशक को शेयर आवंटित हो जाते हैं तो क्रेता डीलर के माध्यम से विक्रेता को एक निश्चित मूल्य पर शेयर बेचने को कह सकता हैं। दूसरे विकल्प के तौर पर वो उसे buyer को शेयर ट्रांसफर करने के लिए भी कह सकता हैं।
  10. शेयर बिक जानें के बाद डीलर के द्वारा दोनों पार्टीज का सेटलमेंट कर दिया जाता हैं।

यहाँ पर ये बात ध्यान देने योग्य हैं की ग्रे मार्केट में शेयर आपसी विश्वास और डीलर के भरोसे करवाए जाते हैं। अगर कोई पार्टी अपने वादे से मुकरती हैं तो उसके ऊपर कोई लीगल एक्शन नहीं लिया जा सकता।

IPO ग्रे मार्केट प्रीमियम कैलकुलेशन

किसी भी IPO की GMP कभी भी स्थिर नहीं रहती। ग्रे मार्केट प्रीमियम शेयर लिस्टिंग तक निरतंर बदलता रहता हैं। चलिए IPO GMP को एक उदाहरण की सहायता से समझते हैं –

मान लीजिये एक नया आईपीओ लांच हुआ हैं जिसकी इशू प्राइस ₹100 हैं। अगर इस आईपीओ का GMP ₹50 चल रहा हैं तो ये शेयर ग्रे मार्किट में ₹150 प्रति शेयर (₹100+₹50) पर ट्रेड होगा। ग्रे मार्केट प्रीमियम की राशि शेयर की डिमांड और सप्लाई पर निर्भर करती हैं। यदि आईपीओ के शेयर्स की मांग कुछ समय में बढ़ गई हैं तो इसकी GMP में भी वृद्धि होगी।

IPO GMP Calculation Example :-

संजीव जिसने ₹1,000 प्रति शेयर की दर से 15 शेयर के लिए आईपीओ में अप्लाई किया हैं। इस आईपीओ का ग्रे मार्केट प्रीमियम ₹400 चल रहा हैं। संजीव ने लिस्टिंग रिस्क को काटने के लिए ग्रे मार्केट डीलर के माध्यम से अपने शेयर ₹1400 प्रति शेयर (₹1000+₹400) बेच दिए। ये आईपीओ एप्लीकेशन मनोज के द्वारा खरीदी गई।

यहां संजीव जो की विक्रेता हैं उसने ₹6,000 (15×400) का निश्चित लाभ तय कर लिया हैं अगर उसे अलॉटमेंट मिला तो।

  केस – 1  केस – 2 
शेयर की संख्या 15 15
मनोज के लिए एक शेयर के लिए लागत ₹1400 ₹1400
कुल लागत (क्रेता) ₹21,000 ₹21,000
Listing per share ₹1,800 ₹1,200
कुल विक्रय मूल्य (₹1,800 × 15) = 27,000 (₹1,200 × 15) = 18,000
क्रेता को लाभ या हानि ₹6,000 (₹3,000)

यहाँ मनोज को पहले केस में  ₹6,000 का लाभ और दूसरे केस में ₹3,000 की हानि हुई हैं। परन्तु संजीव जिसने अपनी आईपीओ एप्लीकेशन बेची थी उसे लिस्टिंग से कोई फर्क नहीं पड़ता। उसने अपने एक लॉट ₹6,000 का प्रॉफिट बना लिया हैं।

क्या GMP लीगल हैं?

चूँकि ग्रे मार्केट एक unofficial मार्केट होता हैं। इस वजह से इसके लिए किसी भी प्रकार के रूल्स और रेगुलेशन नहीं होते हैं। ऑफिसियल तरीके से से ग्रे मार्केट को किसी के द्वारा भी ट्रैक नहीं किया जाता हैं। कोई रूल्स नहीं होने की वजह से सेबी इस प्रकार के सौदों के लिए कोई जिम्मेदारी भी नहीं लेता हैं।

ग्रे मार्केट संचालन कुछ लोगो के द्वारा आपसी सहमति से किया जाता हैं।

इस प्रकार ग्रे मार्केट illegal भी नहीं हैं परन्तु कोई रेगुलेशन नहीं होने की वजह से इसे unregulated कहा जा सकता हैं।

Grey Market ट्रेडिंग क्यों की जाती हैं?

किसी भी नए आईपीओ आने के साथ ही उसकी ग्रे मार्केट में ट्रेडिंग शुरू हो जाती हैं। लेकिन सवाल ये उठता हैं की ग्रे मार्केट में शेयर्स की ट्रेडिंग क्यों की जाती हैं?

ग्रे मार्केट में ट्रेडिंग करने का मुख्य उद्देश्य कंपनी के शेयर्स की लिस्टिंग का अंदाजा लगाकर ज्यादा से ज्यादा मुनाफ़ा कमाना होता हैं। अगर किसी निवेशक को लगता हैं की कंपनी के शेयर का मूल्य भविष्य में बढ़ने वाला हैं तो वो शेयर्स को स्टॉक एक्सचेंज पर लिस्ट होने से पहले ही खरीद लेता हैं।

वही दूसरी ओर ऐसे निवेशक जो शेयर के लिस्ट होने के बाद की जोखिम को वहन नहीं करना चाहते वो शेयर्स को लिस्ट होने से पहले ही ग्रे मार्केट में सेल करके एक्जिट कर लेते हैं।

आईपीओ शेयर की ग्रे मार्केट में ट्रेडिंग होने के कारण वे निवेशक भी शेयर खरीद सकते हैं जो आईपीओ में किसी कारणवश अप्लाई नहीं कर पाए हैं। इसके अतिरिक्त वे निवेशक जो कंपनी के भविष्य को लेकर अधिक आशान्वित हैं वे अधिक से अधिक शेयर खरीदने के लिए आईपीओ ग्रे मार्केट में ट्रेड करते हैं।

ग्रे मार्केट ट्रेडिंग के द्वारा अंडरराइटर्स को भी कंपनी के वैल्यूएशन के बारे में जानकारी मिलती हैं। ग्रे मार्केट के आधार पर अंडरराइटर्स को कंपनी के स्टॉक्स की मांग का अंदाजा मिल जाता हैं।

GMP कौन तय करता हैं?

जिस प्रकार किसी शेयर की कीमत तय होती हैं उसी प्रकार किसी शेयर की GMP भी तय होती हैं। यदि किसी IPO का सब्सक्रिप्शन ज्यादा हैं तो उसकी GMP भी ज्यादा होगी। वैसे ही सब्सक्रिप्शन कम होने पर GMP कम रह सकती हैं। ग्रे मार्केट में स्टॉक की मांग ही उसकी GMP तय करती हैं।

इसको समझने के लिए एक उदाहरण देखते हैं –

मान लीजिये रवि ने ₹500 प्रति शेयर की दर से 30 शेयर आईपीओ में अप्लाई किये। इस आईपीओ में भारी सब्सक्रिप्शन देखा गया। इस समय कंपनी की GMP ₹100 चल रही थी।

किशन (क्रेता) ने रवि को उसकी आईपीओ एप्लीकेशन खरीदने के लिए ऑफर किया। रवि अपने शेयर ग्रे मार्केट में बेचना चाहता हैं परन्तु उसने ₹150 प्रति शेयर प्रीमियम डिमांड किया।

किशन ने सभी डीलर्स के माध्यम से ₹100 प्रीमियम की पूछताछ की परन्तु कोई भी ₹150 के प्रीमियम से नीचे अपने शेयर बेचने को तैयार नहीं हैं। इस प्रकार शेयर की मांग ज्यादा हैं परन्तु सप्लाई कम हैं जिसकी वजह से शेयर की GMP बढ़ जाएगी।

क्या नेगेटिव ग्रे मार्केट प्रीमियम हो सकता हैं?

किसी भी आईपीओ की पॉजिटिव ग्रे मार्केट प्रीमियम के साथ-साथ नेगेटिव GMP भी हो सकती हैं। अगर किसी आईपीओ के एक शेयर की कीमत ₹100 है और बाजार में उस आईपीओ का ट्रेंड गिर रहा हैं। इसकी वजह से ग्रे मार्केट में सेलर उस आईपीओ को ज्यादा बेच रहे हैं। ऐसे में ये शेयर आपको ग्रे मार्केट में इशू प्राइस से भी कम में मिल जायेगा।

शेयर इशू प्राइस से कम मूल्य पर बिक रहा हैं इसका मतलब हुआ की शेयर नेगेटिव GMP पर ट्रेड हो रहा हैं।

कोस्टक रेट क्या हैं (What is Kostak Rate)

आईपीओ ग्रे मार्केट प्रीमियम की तरह एक दूसरी टर्म होती हैं कोस्टक रेट। जब कोई निवेशक किसी आईपीओ में अप्लाई करता हैं परंतु वह आईपीओ में शेयर लेना नहीं चाहता यानि की वह शेयर सब्सक्राइब करके रिस्क उठाना नहीं चाहता। इस स्थिति में वह अपनी आईपीओ एप्लीकेशन को ग्रे मार्केट में कोस्टक रेट में बेच सकता हैं।

अगर राम ने ABC आईपीओ में ₹15,000 में एक लॉट आवेदन किया हैं। उस समय इस आईपीओ की कोस्टक रेट प्रति लॉट ₹500 चल रही हैं। राम अपनी IPO एप्लीकेशन को अलॉटमेंट से पहले ही बेचना चाहता हैं। वह डीलर के माध्यम से श्याम को अपनी एप्लीकेशन ₹500 में बेच देता हैं।

अभी यहां पर राम को आईपीओ में शेयर अलॉट हो या नहीं राम को ₹500 मिल जाएंगे। जबकि Grey Market Premium सौदें में शेयर अलॉट नहीं होने पर सौदा कैंसिल हो जाता हैं। श्याम जब भी कहेगा राम को शेयर ट्रांसफर करने होंगे या बेचने होंगे।

यहां पर श्याम जैसे निवेशक ऐसे ही कई व्यक्तियों से एप्लीकेशन बुक करते हैं। अगर उसने 20 एप्लीकेशन बुक की हैं और उसे पांच एप्लीकेशन भी मिलेगी तो वह अपनी कॉस्ट को रिकवर कर लेगा बशर्ते शेयर अच्छी प्राइस पर लिस्ट हो।

इस सम्पूर्ण प्रक्रिया में में राम के द्वारा कमाए गए ₹500 को ही कोस्टक रेट कहा जाता हैं। कोस्टक रेट प्रति लॉट होती हैं। कोस्टक रेट प्रत्येक आईपीओ के लिए अलग-अलग होती हैं। कोस्टक सौदों में सेलर को फिक्स कोस्टक की राशि मिल मिल जाती हैं। वही buyer को शेयर्स के ऊपर होने वाले लाभ-हानि पर हक़ होता हैं।

सब्जेक्ट टू सौदा क्या हैं (What is Subject to Sauda)

सब्जेक्ट टू सौदा भी एक कोष्टक रेट का ही रुप होता हैं। सब्जेक्ट टू सौदा में आपने कोई आईपीओ एप्लीकेशन लगाई हैं और आप इसे किसी व्यक्ति को ₹1500 per lot में सब्जेक्ट टू सौदा में बेच देते हैं। यदि आपको आईपीओ अलॉट होता हैं तो वह व्यक्ति आपको ₹1500 देगा।

इस प्रकार के सौदों में आईपीओ में शेयर का अलॉटमेंट होने पर ही सौदा मान्य होता हैं। कहने का मतलब हैं की अगर आपको आईपीओ में शेयर अलॉट हुए तब ही आपको क्रेता सब्जेक्ट टू सौदा की राशि का भुगतान करेगा। कोई भी अलॉटमेंट नहीं होने पर सौदा कैंसिल हो जाता हैं। जबकि कोस्टक रेट में अलॉटमेंट हो या न हो कोस्टक रेट का भुगतान buyer द्वारा किया ही जाता हैं।

GMP रिस्क फैक्टर्स

ग्रे मार्केट का सबसे बड़ा जोखिम हैं की इसका कोई रेगुलेटर नहीं हैं।

ग्रे मार्केट में सभी सौदे ओरल होते हैं जो कि कहीं लिखित नहीं होते। बाद में किसी पार्टी द्वारा अपने वादे से मुकर जाने पर कहीं भी जाने का विकल्प नहीं रहता। रेगुलेटर नहीं होने के कारण से सेबी भी इन मामलों में कुछ नहीं कर सकता।

ग्रे मार्केट प्रीमियम विश्वसनीय नहीं हैं। अगर आपको कोई डीलर IPO ग्रे मार्केट प्रीमियम बताता भी हैं या कोई वेबसाइट GMP बताती हैं तो भी इन सभी की विश्वसनीयता पर हमेशा सवाल रहता हैं।

क्या आईपीओ एप्लीकेशन को ग्रे मार्केट में बेचने पर टैक्स लगता हैं?

अधिकांश निवेशक जो अपनी आईपीओ एप्लीकेशन ग्रे मार्केट में बेचते हैं उनको मालूम भी नहीं होता हैं की उनको ग्रे मार्केट के सौदे पर टैक्स भी देना होता हैं। इन सौदों में निवेशक को वास्तविक प्रॉफिट पर 15% की दर से STCG (शॉर्ट टर्म कैपिटल गेन टैक्स) देना होता हैं।

ये उदाहरण आपको बताएगा की ग्रे मार्केट में एप्लीकेशन बेचने के बाद आपके पास कितना वास्तविक लाभ बचता हैं?

मान लीजिये आपने जोमैटो का आईपीओ 150 शेयर ₹100 के हिसाब से लगाया। आपने अपनी आईपीओ एप्लीकेशन कोस्टक रेट पर 2500 रुपए में बेच दी।

सौभाग्यवश आपको आईपीओ अलॉटमेंट मिल गया। आपने जोमैटो के स्टॉक्स buyer के कहने पर ₹30,000 (150×200) में बेच दिए। इस प्रकार आपको अपनी बुक्स में ₹15,000 (30,000-15,000) का प्रॉफिट हुआ।

आपने ₹15000 के प्रॉफिट में से खुद का ₹2500 रखा और ₹12,500 वापस ग्रे मार्केट डीलर को लौटा दिए। अब इस सौदे में टैक्स इस प्रकार लगेगा –

आपने ₹15,000 का प्रॉफिट कमाया जिसमे से ₹2,500 का प्रॉफिट हैं। लेकिन टैक्स आपको पूरे ₹15,000 पर ही देना होगा।

आपको ₹2250 (₹15,000×15%) का STCG देना होगा। आपको वास्तविक प्रॉफिट मात्र ₹250 (2500-2250) का ही हुआ हैं।

क्या आपको GMP देखना चाहिए?

आपको एक निवेशक के तौर पर ग्रे मार्केट प्रीमियम देखना चाहिए या नहीं ये आपके निवेश की अवधि पर निर्भर करता हैं। आप आईपीओ लिस्टिंग गेन के लिए अप्लाई कर हैं या long-term के लिए।

GMP का वैसे किसी स्टॉक के फंडामेंटल से कोई लेना देना नहीं होता। परंतु यह स्टॉक के buzz को जरूर बढ़ाता हैं जिससे शेयर्स की अच्छी प्राइस पर लिस्टिंग होने की संभावना बढ़ जाती हैं।

अगर आप बस लिस्टिंग गेन के लिए अप्लाई करना चाहते हैं तो आप ग्रे मार्केट प्रीमियम को ट्रैक कर सकते हैं। GMP से आपको एक अंदाजा लग जाता हैं की स्टॉक की लिस्टिंग अच्छी होगी या नहीं। लेकिन आप लंबे समय के लिए आईपीओ शेयर्स में निवेश करने के बारे में सोच रहे हो तो आपको GMP,  सब्सक्रिप्शन फिगर, कोस्टक आदि चीजों पर ध्यान देने की बिल्कुल भी आवश्यकता नहीं हैं। इसके लिए आपको कंपनी के फंडामेंटल्स, कंपनी की स्ट्रेंथ आदि देखने चाहिए।

IPO एप्लीकेशन ग्रे मार्केट में कैसे बेचें और ख़रीदे?

ग्रे मार्केट एक अनऑफिशियल मार्केट होता हैं। इसलिए कोई ऑफिशियल व्यक्ति या बिजनेस ग्रे मार्केट से संबंधित नहीं होता। अगर आपको अपने आईपीओ स्टॉक्स को ग्रे मार्केट में खरीदना और बेचना हैं तो आपको एक लोकल ब्रोकर ढूंढना होगा। इस डीलर को मध्यस्थ रखकर आप ग्रे मार्केट शेयर खरीद और बेच सकते हैं। इस डीलर का काम क्रेता और विक्रेता को आपस में मिलाना होता हैं।

निष्कर्ष -What is GMP in IPO

किसी आईपीओ की डिमांड का पता लगाने के लिए GMP एक अच्छा संकेतक होता हैं। हालाँकि, ग्रे मार्केट प्रीमियम की प्रकति के कारण इसमें हेर-फेर की सम्भावना बहुत अधिक रहती हैं।

एक जागरूक निवेशक के तौर पर आपको किसी भी IPO में निवेश करने से पहले उसके सभी पहलुओं पर ध्यान देना आवश्यक हैं।

दोस्तों, आज आपने इस आर्टिकल के माध्यम से समझा की What is IPO Grey Market Premium, कोस्टक रेट क्या हैं। अगर आपको ये जानकारी अच्छी लगी हो तो कृपया इस पोस्ट को अपने साथियों के साथ जरूर शेयर करें।

FAQ :

  1. GMP की फुल फॉर्म क्या हैं?

    GMP की फुल फॉर्म ग्रे मार्केट प्रीमियम होती हैं।

  2. क्या GMP को विश्वशनीय माना जा सकता हैं?

    रेगुलेशन नहीं होने की वजह से ग्रे मार्केट प्रीमियम विश्वसनीय नहीं हैं। आईपीओ लिस्टिंग पर आपको GMP जितना मूल्य मिले उसकी भी कोई गारंटी नहीं हैं।

  3. आईपीओ को ग्रे मार्केट में कैसे बेचें?

    IPO को ग्रे मार्केट में बेचने के लिए कोई प्लेटफार्म नहीं हैं। अगर आपको अपना IPO ग्रे मार्केट में बेचना हैं तो आपको कोई लोकल ब्रोकर से सम्पर्क करना होगा।

  4. आईपीओ GMP कहां से चेक करें?

    आईपीओ GMP आप ipocentral और चित्तौरगढ़ की वेबसाइट से चेक कर सकते हैं।

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