शेयर मार्केट की शब्दावली | Share Market Terminology in Hindi

नमस्कार दोस्तों !!!

भारत में कुछ सालों पहले तक निवेश के नाम पर FD और गोल्ड ही सबसे अधिक लोकप्रिय थे। लेकिन समय के साथ-साथ इसमें काफी बदलाव आया हैं। अब स्टॉक मार्केट और म्यूच्यूअल फण्ड में लोग सबसे अधिक निवेश करना पसंद करते हैं।

अगर आप भी शेयर मार्केट में निवेश करना चाहते हैं, लेकिन आपको शेयर मार्केट की शब्दावली की सही जानकारी नहीं मिल पा रही हैं तो आज आपकी ये समस्या समाप्त हो जाएगी।

दोस्तों, इस आर्टिकल में हम सम्पूर्ण शेयर मार्केट की शब्दावली को जानेंगे जिससे आपकी स्टॉक मार्केट शब्दावली को लेकर सभी शंकाएं ख़त्म हो जाएगी।

शेयर मार्केट की शब्दावली | Share Market Terminology in Hindi

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[1] शेयर – Share

शेयर का मतलब होता है “हिस्सा” यानि की किसी कंपनी के स्वामित्व का एक हिस्सा जो की एक शेयर (one share) होता हैं। इस प्रकार एक शेयर कंपनी की पूंजी का सबसे छोटा भाग होता हैं।

परिभाषा के तौर पर शेयर का अर्थ होता है, “किसी कंपनी की कुल पूंजी को कई सामान हिस्सों में बांट देने पर जो पूंजी का सबसे छोटा हिस्सा बनता है उस हिस्से को शेयर कहा जाता है।”

किसी भी कंपनी के शेयर आप स्टॉक ब्रोकर के माध्यम से ख़रीद सकते हैं।

[2] बोनस शेयर – Bonus Share

जब किसी कम्पनी द्वारा अपने अर्जित लाभों में से बनाये गए रिजर्व को शेयर्स के रूप में वर्तमान शेयर होल्डरों के मध्य आनुपातिक रूप से बाँट दिया जाता हैं तो उसे बोनस शेयर कहते हैं।

उदाहरण के लिए अगर कोई कंपनी ने 2:1 में बोनस की घोषणा की हैं तो प्रत्येक शेयरहोल्डर जिसके पास एक शेयर हैं उसे दो अतिरिक्त शेयर मिलेंगे।

बोनस शेयर, डिविडेंड के विकल्प के रूप में दिए जाते हैं।

[3] डिविडेंड – Dividend

Dividend वह होता हैं जो कंपनी अपने नेट प्रॉफिट में से अपने शेयरधारकों (shareholders) को बांटती हैं। कंपनी अपने शेयर होल्डर्स को कंपनी में निवेश करने और विश्वास जताने के कारण उन्हें भी कंपनी के लाभ में से कुछ हिस्सा रिवॉर्ड के रूप में देती हैं।

डिविडेंड सीधा शेयर धारक के बैंक अकाउंट में क्रेडिट किया जाता हैं।

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[4] स्टॉक स्प्लिट – Stock Split

शेयर स्प्लिट किसी कंपनी के स्टॉक्स के विभाजन की प्रक्रिया है। स्टॉक स्प्लिट एक कॉर्पोरेट एक्शन होता है जिसमें कंपनियां अपने स्टॉक्स को एक निश्चित अनुपात में विभाजित कर देती है।

स्टॉक स्प्लिट के अनुपात में उस कंपनी के शेयर के टुकड़े हो जाते हैं और प्रत्येक टुकड़ा एक नया शेयर बन जाता है। स्टॉक स्प्लिट होने की वजह से कंपनी के शेयर मार्केट में बढ़ (increase) जाते है।

इसके साथ ही कंपनी की शेयर प्राइस और फेस वैल्यू उसी अनुपात में कम हो जाते हैं जिसमें स्टॉक स्प्लिट होता हैं।

मान लेते है कि हमारे पास XYZ लिमिटेड के 10 शेयर हैं जिसकी शेयर प्राइस ₹1,000 है। जबकि इसकी फेस वैल्यू ₹10 है। इस प्रकार हमारे कुल इन्वेस्टमेंट की वैल्यू ₹10,000 (₹1,000×10) हुई।

XYZ लिमिटेड अपने शेयर्स को 2:1 में स्प्लिट करने का निर्णय करती है। इसका मतलब हुआ कि इस कंपनी का 1 शेयर 2 शेयर्स में बदल जाएगा। इसके साथ ही शेयर प्राइस और फेस वैल्यू आधे हो जायेंगे।

स्टॉक स्प्लिट के बाद हमारे 10 शेयर, 20 शेयर में बदल जाएंगे। जबकि शेयर प्राइस ₹1,000 से ₹500 हो जाएगी। साथ ही फेस वैल्यू ₹10 से ₹5 हो जाएगी।

[5] बिड प्राइस – Bid Price

Bid Price किसी शेयर की वह प्राइस होती है जिस पर कोई भी Buyer उस शेयर को खरीदने के लिए तैयार बैठा हो। जैसे की आपको SBI बैंक का एक शेयर ₹500 में खरीदना हैं और आप इस मूल्य पर अपना आर्डर प्लेस करते हैं। आपकी ये ₹500 की प्राइस बिड प्राइस कहलाएगी।

[6] आस्क प्राइस – Ask Price

Ask Price किसी शेयर की वह Price होती है जिस पर कोई भी Seller उस शेयर को बेचने के लिए तैयार बैठा हो।

[7] स्प्रेड – Spread

किसी शेयर की Bid Price और Ask Price के बीच के अंतर को स्प्रेड कहते हैं।

[8] बुल मार्केट – Bull Market

बुल मार्केट में स्टॉक मार्केट में तेजी रहती हैं। बुल मार्केट में निवेशक स्टॉक प्राइस के बढ़ने की उम्मीद करते हैं।

[9] बेयर मार्केट – Bear Market

बेयर मार्केट में मंदी का दौर रहता हैं। बेयर मार्केट में निवेशक मूल्यों में गिरावट की उम्मीद करते हैं।

[10] लिमिट ऑर्डर – Limit Order

लिमिट ऑर्डर एक ऐसा ऑर्डर होता हैं, जिसमें Buy या Sell का ऑर्डर एक निश्चित प्राइस पर लगाया जाता हैं। जब ये प्राइस हिट होती हैं तब आपका ऑर्डर execute हो जाता हैं।

दोस्तों, अगर आपको यहां तक शेयर मार्केट की शब्दावली की जानकारी अच्छी लगी हो तो आर्टिकल को पढ़ते रहिये –

[11] मार्केट ऑर्डर – Market Order

मार्केट ऑर्डर में आप जो भी सौदा लगाते हैं वो तुरंत Current Market Price पर एक्सीक्यूट हो जाता हैं।

[12] MIS या इंट्राडे ऑर्डर – MIS or Intraday Order

MIS का मतलब Margin Intraday Square-Off होता हैं। जब आप किसी शेयर में किसी एक ट्रेडिंग दिवस में होने वाली उठा-पटक का फ़ायदा उठाना चाहते हैं तो आपको MIS या इंट्राडे ऑर्डर का चुनाव करना होता हैं।

इस प्रकार के ऑर्डर में आपको शेयर्स की वास्तविक डिलीवरी नहीं मिलती।

[13] CNC या डिलीवरी ऑर्डर – CNC or Delivery Order

CNC की फुल फॉर्म Cash And Carry होता हैं। CNC या डिलीवरी के सौदें तब किये जाते हैं जब आप शेयर्स की वास्तविक डिलीवरी उठाते हैं।

लॉन्ग टर्म के लिए शेयर होल्ड करने के लिए CNC या डिलीवरी विकल्प का चुनाव किया जाता हैं।

[14] स्टॉप लॉस – Stop Loss

स्टॉप लॉस किसी शेयर का वह Price Point होता हैं, जहां पर कोई ट्रेडर या इन्वेस्टर अपना Loss Book करके शेयर से निकलने के लिए तैयार बैठे हो। शेयर मार्केट में नुकसान को कंट्रोल करने के लिए Stop Loss का इस्तेमाल किया जाता हैं।

[15] शॉर्ट सेल – Short Selling

सामान्य ट्रेडिंग में हम पहले शेयर खरीदकर बाद में बेचते हैं। परन्तु Short Sell में शेयर पहले बेचे जाते हैं और बाद में ख़रीदे जाते हैं।

इस प्रकार Short Selling में निवेशक शेयर की प्राइस में होने वाली गिरावट का फायदा उठाने के लिए शेयर्स को ब्रोकर से उधार लेकर बेच देता हैं। स्टॉक का possession नहीं होने के बावजूद स्टॉक को बेच देने के कारण इसे Short करना कहा जाता हैं।

स्टॉक की प्राइस नीचे आते ही ट्रेडर स्टॉक को वापस खरीद लेता हैं। इस प्रकार वह अपनी पोजीशन को square off कर लेता हैं।

Selling Price और Buying Price के बीच का अन्तर आपका Profit/Loss होता हैं।

[16] ब्रोकर – Broker

ब्रोकर Buyers और Sellers को मिलाने का काम करता हैं। इस प्रकार एक स्टॉक ब्रोकर स्टॉक एक्सचेंज और इन्वेस्टर के मध्य एक मध्यस्थ का काम करता हैं।

Broker के Platform का उपयोग करके आप शेयर्स खरीद और बेच सकते हैं।

[17] स्टॉक एक्सचेंज – Stock Exchange

स्टॉक एक्सचेंज ऐसी जगह होती हैं, जहां सभी कंपनिया Listed होती हैं। सभी स्टॉक ब्रोकर Stock Exchange के मेंबर होते हैं। वर्तमान में भारत में NSE और BSE दो मुख्य स्टॉक एक्सचेंज हैं।

[18] ट्रेडिंग अकाउंट – Trading Account

शेयर्स को Buy और Sell करने के लिए Trading Account आवश्यक होता हैं। ट्रेडिंग अकाउंट को किसी स्टॉक ब्रोकर के पास खुलवाया जाता हैं।

[19] डीमैट अकाउंट – Demat Account

यदि आप किसी कंपनी के शेयर ख़रीदते हैं तो आपको उन्हें होल्ड करने के लिए डीमैट अकाउंट की जरुरत होगी। डीमैट अकाउंट बिलकुल आपके बैंक आकउंट की तरह कार्य करता हैं।

[20] सेंसेक्स – Sensex

सेंसेक्स भारतीय स्टॉक मार्केट का एक सूचकांक (Index) हैं। Sensex बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज (BSE) पर लिस्टेड सभी कंपनियों का प्रतिनिधित्व करता हैं।

सेंसेक्स BSE की टॉप 30 कंपनियों से मिलकर बना होता हैं। ये 30 कंपनिया बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज पर लिस्ट होती हैं जो बाज़ार पूंजीकरण (Market Capitalization) के आधार पर सबसे बड़ी कंपनिया होती हैं। जिस प्रकार ब्लड रिपोर्ट किसी व्यक्ति की सेहत का हाल बताता हैं उसी प्रकार सेंसेक्स भी सम्पूर्ण मार्केट का हाल बताता हैं। इसलिए सेंसेक्स को भारतीय घरेलू बाजार की नब्ज भी माना जाता हैं।

अगर सेंसेक्स की इन 30 कंपनियों का मूल्य बढ़ता हैं तो सेंसेक्स भी ऊपर ओर चढ़ता हैं। वैसे ही सेंसेक्स के शेयर्स के मूल्य में गिरावट आने से सेंसेक्स के मूल्य में भी गिरावट देखी जाती हैं।

[21] निफ़्टी 50 – Nifty 50

निफ़्टी 50 भी एक इंडेक्स होता हैं, जो NSE (नेशनल स्टॉक एक्सचेंज) पर लिस्टेड कंपनियों का प्रतिनिधित्व करता हैं।

निफ़्टी 50 NSE की मार्केट कैपिटलाइजेशन के आधार पर 50 सबसे बड़ी कंपनियों से मिलकर बना होता हैं।

[22] सेबी – SEBI

SEBI यानि की Securities Exchange Board of India. सेबी भारत में स्टॉक मार्केट का नियामक (regulator) हैं। जैसे बैंकों के लिए रेगुलेटर RBI होता हैं वैसे ही शेयर मार्केट में सेबी होता हैं।

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[23] मार्जिन – Margin

मार्जिन एक उधार की तरह होता हैं जो स्टॉक ब्रोकर के द्वारा प्रोवाइड करवाया जाता हैं। मार्जिन का उपयोग करके शेयर को ख़रीदा और बेचा जाता हैं।

उदाहरण के लिए आपके पास ₹100 हैं और आपका ब्रोकर आपको इस पर कुल ₹200 पर ट्रेडिंग करने की अनुमति देता हैं तो यहाँ ऊपर वाले ₹100 मार्जिन के होंगे।

[24] वोलेटिलिटी – Volatility

वोलिटिलिटी का मतलब शेयर की कीमतों में उतार-चढ़ाव की सीमा से हैं। ट्रेडिंग सेशन के दौरान हाई वोलिटिलिटी स्टॉक में असामान्य हाई और लो को देखा जाता हैं। जबकि कम वोलेटाइल स्टॉक में कम उतार-चढ़ाव होता हैं।

[25] BTST – Buy Today Sell Tomorrow Trading

किसी शेयर को आज खरीदकर कल बेच देना BTST (Buy Today Sell Tomorrow Trading) कहलाता हैं।

[26] आईपीओ – Initial Public Offering

IPO की प्रक्रिया द्वारा एक प्राइवेट कंपनी या कॉर्पोरेशन अपना कुछ हिस्सा बेचकर पब्लिक कंपनी (सार्वजनिक कंपनी) बन जाती हैं।

किसी कंपनी का IPO बाजार में आने से निवेशकों को उनके शेयर्स खरीदकर उस कंपनी के व्यापार में भागीदार बनने का सुनहरा अवसर होता हैं। आईपीओ के माध्यम से उस कंपनी के शेयर्स स्टॉक एक्सचेंज पर लिस्ट होते हैं।

[27] FII

FII यानि की Foreign Institutional Investors. जब विदेशी संस्थागत निवेशक (FII) बाजार में निवेश करते हैं तो बाजार की चाल बहुत अधिक तेज होती हैं, वही जब यह बाजार से पैसा निकालते हैं तो बाजार में अत्यधिक गिरावट आ सकती हैं।

[28] वार्षिक विवरण – Annual Report

एक एनुअल रिपोर्ट किसी कंपनी का फाइनेंशियल इवैल्यूएशन (Financial Evaluation) होता हैं। एनुअल रिपोर्ट में कंपनी की फाइनेंशियल स्थिति और संचालन की रिपोर्ट मिलती है।

एनुअल रिपोर्ट किसी एक निर्धारित वित्तीय वर्ष में कंपनी के प्रदर्शन को दर्शाती हैं।

इसमें कंपनी के मुख्य व्यक्तियों के बारे में, कंपनी की गतिविधियों के बारे में, कंपनी के वित्तीय परिणाम, आगामी प्रोजेक्ट्स, ऑडिट रिपोर्ट, बैलेंस शीट, लाभ-हानि का लेखा-जोखा आदि शामिल होते हैं।

[29] बाजार पूँजीकरण – Market Capitalization

किसी कंपनी के द्वारा जारी किए गए कुल शेयरों की बाजार कीमत उस कंपनी का ‘मार्केट कैपिटलाइजेशन’ कहलाता हैं।

उदाहरण के लिए, किसी कंपनी के मार्केट में 1 लाख शेयर हैं और मार्केट में प्रति शेयर कीमत ₹10 हैं तो उस कंपनी का बाजार पूँजीकरण ₹10 लाख होगा। (1 लाख शेयर × ₹10)

कंपनी की लार्ज कैप, मिड कैप और स्मॉल कैप की स्थिति मार्केट कैपिटलाइजेशन के आधार पर ही तय होती हैं।

[30] NSE – National Stock Exchange

NSE भारत का सबसे बड़ा स्टॉक एक्सचेंज हैं। स्टॉक एक्सचेंज पर कंपनियां लिस्टेड होती हैं।

[31] BSE – Bombay Stock Exchange

BSE भारत का दूसरा सबसे बड़ा और सबसे पुराना स्टॉक एक्सचेंज हैं, जहां पर कंपनियां लिस्टेड हैं।

[32] बाय बैक – Buy Back

किसी कंपनी द्वारा जब अपने ही शेयरों को मार्केट से वापस खरीदने का निर्णय लिया जाता हैं तो उसे ‘बाय बैक’ कहा जाता हैं। बाय बैक के द्वारा कंपनी बाजार में उपलब्ध अपने शेयर्स की संख्या घटाती हैं। इस प्रक्रिया से प्रति शेयर लाभ में इजाफा होता हैं साथ ही बैलेंस शीट भी बेहतर होती हैं।

[33] इनसाइडर ट्रेडिंग – Insider Trading

इनसाइडर ट्रेडिंग एक अवैध कार्य होता हैं। जब किसी व्यक्ति के पास किसी कम्पनी की गुप्त सूचनाएँ रहती हैं तो इस प्रकार वह भारी मात्रा में शेयरों का क्रय-विक्रय करके लाभ कमा सकता हैं। इस प्रकार की ट्रेडिंग को इनसाइडर ट्रेडिंग कहते हैं।

[34] अप्पर सर्किट – Upper Circuit

सेबी ने अलग-अलग प्रकार के सर्किट लेवल तय किये हैं जो आमतौर पर 2%, 5%, 10% और 20% होते हैं। यदि किसी शेयर का दाम किसी ट्रेडिंग दिन पर उसके पूर्व निर्धारित ऊपरी लेवल को टच करता हैं तो ये Upper Circuit होता हैं।

यदि किसी शेयर पर upper सर्किट लगता हैं तो इसका मतलब हैं कि उस शेयर के Buyers बहुत ज्यादा हैं। लेकिन sellers मौजूद नहीं हैं। इसकी वजह से हाई डिमांड और लॉ सप्लाई की वजह से Upper circuit हिट होता हैं।

[35] लॉअर सर्किट – Lower Circuit

अगर किसी शेयर का दाम किसी ट्रेडिंग दिन पर उसके पूर्व निर्धारित निचले लेवल को टच करता हैं तो ये Lower Circuit होता हैं।

कोई शेयर लोअर सर्किट हिट करता हैं तो उसमें बहुत सारे sellers मौजूद होते हैं। लॉ डिमांड और हाई सप्लाई की वजह से शेयर पर लोअर सर्किट लगता हैं।

[36] स्विंग ट्रेडिंग – Swing Trading

स्विंग ट्रेडिंग, एक्टिव ट्रेडिंग का एक प्रसिद्ध तरीका हैं, जिसमें किसी शेयर को एक से अधिक दिनों या दो सप्ताह के के लिए रखा जाता हैं।

स्विंग ट्रेडिंग में पोजीशन को कम से कम रात भर के लिए रखा जाता हैं, क्योंकि इसमें पोजीशन को इंट्राडे ट्रेडिंग के समान उसी दिन स्क्वायर ऑफ नहीं किया जा जाता।

स्विंग ट्रेडर्स, इंट्राडे ट्रेडर्स के समान सिद्धांतों पर काम करते हैं, क्योंकि इसका उद्देश्य शॉर्ट-टर्म प्राइस मूवमेंट से मुनाफा कमाना होता हैं।

[37] पोज़िशनल ट्रेडिंग – Positional Trading

Position Trading में किसी स्टॉक को कुछ महीनों से लेकर 1 साल के अंदर बेच दिया जाता हैं।

[38] गिरवी शेयर – Pledged Share

शेयर एक वित्तीय सिक्योरिटी होती हैं जिस पर प्रमोटर (Promoter) या निवेशक (investor) का पूर्ण अधिकार होता हैं।

यदि प्रमोटर्स को कंपनी के सञ्चालन के लिए धन की आवश्यकता हैं तो वे शेयरों को बैंकों के पास धन के लिए गिरवी रख सकते है, और इसके बदले उधार ले सकता हैं।

[39] पेनी स्टॉक – Penny Stock

आमतौर पर पैनी स्टॉक वे स्टॉक होते हैं जिनकी कीमत ₹ 10 से कम होती हैं। इस प्रकार के शेयर्स में हाई रिस्क के साथ हाई रिटर्न देने की क्षमता होती हैं।

[40] कॉन्ट्रैक्ट नोट – Contract Note

जब मार्केट से शेयर की खरीदी-बिक्री होती हैं तब स्टॉक ब्रोकर अपने ग्राहकों को कॉन्ट्रैक्ट नोट (contract note) भेजता हैं।  कॉन्ट्रैक्ट नोट में शेयर के लेनदेन से संबंधी रेट, ब्रोकरेज, टैक्स आदि जानकारी होती हैं।

[41] DP – Depository Participate

डिपॉजिटरी पार्टिसिपेंट (DP), स्टॉक एक्सचेंज और निवेशक के बीच वह कड़ी होती हैं, जो शेयर्स या सिक्योरिटी को संभाल कर इलेक्ट्रॉनिक रूप में रखता हैं। जैसे की अगर आपका डीमैट अकाउंट Upstox या Zerodha में हैं तो आपके शेयर्स CDSL में जमा रहेंगे।

भारत में NSDL (National Securities Depository)और CDSL (Central Depository Services India Ltd) दो डिपॉजिटरी है।

[42] फोरेक्स मार्केट – Forex Market

Forex Market वह मार्केट होता हैं जहां Currency (जैसे की रुपये, डॉलर, पाउंड, यूरो) को ख़रीदा और बेचा जाता हैं।

[43] 52-Week High

पिछले 52 हफ्तों के भीतर किसी स्टॉक की उच्चतम कीमत (price) को 52 week high कहा जाता हैं।

[44] 52-Week Low

पिछले 52 सप्ताह के भीतर किसी स्टॉक सबसे कम कीमत को 52 week low कहा जाता हैं।

[45] ETF – Exchange Traded Funds

ETF एक प्रकार से एक सिक्योरिटी होता है जिसमें stocks, securities का कलेक्शन होता है जो किसी विशेष इंडेक्स  या सेक्टर के होते हैं।

ETF एक्सचेंज पर ट्रेड होते हैं जैसे कि NSE, BSE.  इसका मतलब हुआ कि Exchange पर ETF  खरीदने-बेचने के लिए एक Buyer और seller होना आवश्यक है। ETF के खरीदने और बेचने का तरीका बिलकुल Shares जैसा ही होता हैं।

[46] कॉर्पोरेट एक्शन – Corporate Action

जब किसी कंपनी द्वारा कंपनी से सम्बंधित कोई निर्णय लिया जाता हैं तो इसे कॉर्पोरेट एक्शन कहा जाता हैं, जैसे की बोनस इशू, राइट इशू, डिविडेंड आदि।

[47] पोर्टफोलियो – Portfolio

पोर्टफोलियो आपके द्वारा ख़रीदे गए अलग-अलग शेयर्स, म्यूच्यूअल फण्ड या दूसरे इंस्ट्रूमेंट जैसे की बॉन्ड्स, डिबेंचर आदि का एक कलेक्शन होता हैं। पोर्टफोलियो में सिर्फ शेयर्स भी हो सकते हैं या दूसरे फाइनेंसियल इंस्ट्रूमेंट भी शामिल हो सकते हैं।

[48] बॉन्ड्स – Bonds

जब कोई कंपनी या Government सीधे आम जनता से पैसे उधार लेती हैं तो उसके बदले में जनता को Bonds जारी कर देती हैं।

इसके बदले में वो एक निश्चित ब्याज दर का भुगतान करने का वादा करता हैं। इन जारी किये बॉन्ड्स पर ब्याज दर लिखी होती हैं जिसे कूपन रेट भी कहा जाता हैं।

[49] डिबेंचर – Debenture

डिबेंचर भी बॉन्ड्स की तरह होते हैं जिनके बदले कंपनियों द्वारा Market से पैसे उठाये जाते हैं। ये Bonds जितने सुरक्षित नहीं होते हैं।

[50] मल्टीबेगर – Multibagger

जब भी कोई शेयर बहुत ही अच्छा प्रॉफिट कमा कर देता हैं और वह शेयर आपके पैसे को बहुत गुना कर देता हैं तो उस प्रॉफिट को Multibagger Return और स्टॉक को Multibagger Stock कहा जाता हैं।

[51] कमोडिटी मार्केट – Commodity Market

ये मार्केट वो मार्केट होता हैं जहां कमोडिटी जैसे की Gold, Silver, Crudeoil आदि को ख़रीदा और बेचा जाता हैं।

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निष्कर्ष – शेयर मार्केट की शब्दावली | Share Market Terminology in Hindi

दोस्तों, आज आपने इस आर्टिकल में शेयर मार्केट की संपूर्ण शब्दावली को जाना और समझा।

उम्मीद करता हूं कि इससे आपके काफी कांसेप्ट क्लियर हुए होंगे। अगर आपको यह आर्टिकल अच्छा लगा हो तो इसे अपने साथियों के साथ जरूर शेयर करें और अगर आपके शेयर मार्केट या म्यूचुअल फंड से संबंधित कोई भी सवाल हैं तो आप मुझे कमेंट बॉक्स के माध्यम से बता सकते हैं।

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